(महामना पं. मदनमोहन मालवीय पुण्यतिथि : 12 नवम्बर)
देश को नयी सोच, नयी दिशा व प्रगति का मार्ग प्रशस्त कराने में पंडित मदनमोहन मालवीयजी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है । ईमानदारी, निर्भीकता व परहितपरायणता उनमें कूट-कूट के भरी थी । पूज्य बापूजी का यह ब्रह्मवाक्य है कि ‘यदि आप संसार के प्रलोभनों व धमकियों से न हिले तो संसार को अवश्य हिला देंगे ।’ पं. मालवीयजी के जीवन में यह स्पष्ट झलकता है ।
एक बार विद्यालय की परीक्षा में मालवीयजी निरीक्षण-कार्य में लगे हुए थे । वहाँ एक विद्यार्थी को नकल करते देख उनके हृदय में उसके प्रति करुणा का भाव उपजा । वे बोले : ‘‘ऐसी किताबी परीक्षाओं में ही तुम्हें नकल की शरण लेने की आदत पड़ जायेगी तो आगे जीवन में आनेवाली कठिन परीक्षाओं में न जाने कितनी बार अधर्म का सहारा लेना पड़ेगा !’’ और उन्होंने उसे परीक्षा-कक्ष से निकाल दिया । तब उस अभद्र लड़के ने गुस्से में आकर मालवीयजी को धमकाते हुए कहा : ‘‘मैं आपको देख लूँगा !’’
बात पूरे विद्यालय में फैल गयी । अन्य शिक्षकों ने कहा : ‘‘आपने व्यर्थ में ही मुसीबत मोल ले ली है । अब आप विद्यालय अकेले न आया कीजिये ।’’ परंतु मालवीयजी तो निर्भीकतापूर्वक अकेले आते-जाते रहे ।
एक दिन उस लड़के ने मालवीयजी को अपने घेरे में ले लिया और मजाक उड़ाते हुए बोला : ‘‘उस दिन तो आप ज्यादा ही ईमानदारी दिखा रहे थे ! अब देखो मैं क्या करता हूँ...’’
मालवीयजी ने पहले तो उस लड़के को अच्छे से समझाया पर वह नहीं माना । उन्होंने देखा कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते । मालवीयजी ने बड़ी स्फूर्ति दिखाते हुए उसे दो पटकियाँ खिला दीं । उस गुंडाछाप लड़के के किसी भी साथी की उन्हें कुछ करने की हिम्मत नहीं हुई । उस लड़के ने मालवीयजी की ओर देखा तो उनकी आँखों में उसे द्वेषरहित सौम्यता, करुणा नजर आयी । अब उस लड़के को अपनी गलती का इतना पश्चात्ताप हुआ कि वह मालवीयजी के चरणों में दंडवत् गिर पड़ा और अश्रुधाराओं से उसने उनके चरणोंं का अभिषेक कर दिया । अश्रुगंगा से पवित्र हुए अपने गालों पर अब की बार मालवीयजी की प्रेमभरी थपकियाँ पाकर वह गद्गद हो गया । उसकी मति इतनी निर्मल हो गयी कि उन पटकियों और इन थपकियों में उसे एक जैसी करुणा नजर आने लगी ।
पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘अनुशासन में प्यार और सामनेवाले का हित तथा शुद्ध ज्ञान और मंगल भावना नहीं भरी है तो वह अनुशासन अहंपोषक और शासितों को सतानेवाला हो जायेगा । बिना प्यार का अनुशासन झगड़ा, तंगदिली और खिंचाव लायेगा । प्यार में से अनुशासन निकला तो मोह बन जायेगा । अनुशासन तो जरूरी है पर उसमें प्यार मिला हुआ हो ।’’
यह सिद्धांत बापूजी के जीवन में भी मूर्तिमान हुआ देखा जा सकता है । इस सिद्धांत के पालन में विशुद्ध आत्मदृष्टि की प्रधानता यह बापूजी के अनुशासन की अद्वितीय विशेषता है ।
पं. मालवीयजी एवं पूज्य बापूजी की तरह हम भी अनुशासन और प्यार का सुंदर समन्वय करें तो हमारा जीवन भी दिव्य सुगंध से सुमधुर बनेगा तथा कुटुम्ब, नगर और समाज के लोग भी हमसे मिलकर तृप्त हो जायेंगे ।
गोरखपुर से संजय कुमार की रिपोर्ट
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