वोट की राजनीति इस हद तक गिर चुकी है कि अंग्रेजो की वह चाल भी फेल हो गई कि फूट डालो राज करो
कभी कांग्रेस में सत्ता में बैठे कमलनाथ मुसलमानों को रिझाने के लिए हिंदू मुस्लिम करते नजर आते है तो कभी मोहन भागवत
एक तरफ मोहन भागवत हिंदू राष्ट्र मुस्लिमों बिना पूर्ण नही मुस्लिमों बिना हिंदुत्व नही कहते नजर आते है तो कभी कमल नाथ हिंदुत्व भावना से निपटने के लिए वोट डालने तक इंतजार करने की बात कहते नजर आते है।
BBC की रिपोर्ट के अनुसार बात सिर्फ मोदी के पसमांदा, मुसलमानों तक पहुँच की नहीं है, ये भी याद रखा जाना चाहिए कि हिंदुत्व की विचारधारा के सबसे बड़े संगठन, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के मोहन भागवत भी कह रहे हैं कि बिना मुसलमानों के हिंदुत्व नहीं.
एक ओर नरेंद्र मोदी जहाँ बार-बार 'पिछड़े मुसलमानों का हिस्सा सैयदों-पठानों ने हड़प लिया', की बात कर रहे हैं और 'अल्पसंख्यकों के साथ नए सामाजिक समीकरण तैयार करने' का मुद्दा उठा रहे हैं. वहीं आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीरूद्दीन शाह, पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी, उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार शाहिद सिद्दीक़ी से लेकर जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद के मौलाना अरशद मदनी तक से मिलते रहे हैं.
संघ का संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच पिछले लगभग 15 वर्षों से समुदाय के भीतर पहुंच बनाने में लगा है.
नरेंद्र मोदी ने पहली बार सीधे तौर पर मुसलमानों के भीतर पिछड़े समुदाय का ज़िक्र साल 2017 में यानी प्रधानमंत्री का पद समंभालने के दो साल बाद ही पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में किया था, जिसमें उन्होंने कहा था "मुसलमानों और दूसरे धर्मों में भी पिछड़ी जातियाँ मौजूद हैं. पिछड़ी जातियों को मिलने वाली सुविधाएं मुसलमानों के पिछड़े वर्गों तक भी पहुंचनी चाहिए. सैयद और पठान इन सुविधाओं को हथिया लेते हैं."
साल 2022 में हैदराबाद में उन्होंने कहा कि समुदायों को केवल एक वर्ग के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि उसके भीतर भी समाज में स्थान के आधार पर अलग-अलग हित और विचार होते हैं.
हैदराबाद में पसमांदा मुसलमानों में पार्टी के प्रति भरोसे की कमी को 'स्नेह यात्राओं' के ज़रिए पाटने की बात कही गई थी.
नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के पसमांदा मुसलमानों के एक प्रतिनिधि मंडल से लंबी मुलाक़ात की थी जिसके कुछ ही माह बाद पार्टी की यूपी इकाई ने अपने यहाँ बुनकर सेल की स्थापना कर दी थी.
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